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Sunday, May 9, 2021

बर्फ़ का गोला

बर्फ़ का गोला 



"नीतू , पानी , भाग!" अमन गोली के पीछे से दौड़ता हुआ उसके बर्फ़ किय दोस्तों को पानी कर भगा।  गोली पिछले डेढ़ घंटे से सबको "बर्फ़ !" कह कर जमाने का खूब जोरदार पर नाकाम कोशिश में लगा हुआ था। गर्मी और पसीने की कच-कच से परेशान हो 
गोली: अरे यार ! मैं नहीं खेलना ये।  में थक गया हूँ .... 
अमन, नीतू , आफ़रीन और शुभम - गोली को और सताने का मन तो था पर पसीने में लथ-पथ इस खेल से उन सबका मन उचाट  चूका था। जून की गर्मी में शाम के ५ (5) बजे का समय भी दोपहर की देहलती धुप के समान लग रहा था। 
उस चिलमिलाती गर्मी में एक टन्न की झंकार बच्चों के कानों पर पड़ी। कांच की बोतलों पर चम्मच टन-टनाता एक अधेड़ उम्र का आदमी अपनी तीली समान बाज़ुओं से ठेला ठकेलता आ रहा था। 
शुभम : अरे देखो .... ये गोले वाला है ना ??
आफ़रीन : चुस्की वाला ??
शुभम : हाँ , वो ही। बर्फ़ का गोला.... ठंडा, मीठा , टेस्टी !!
अमन : हाँ , चल खाते है !
नीतू : अरे नहीं , मेरी मम्मी ने ऐसे ठेलो से कुछ भी खाने को मना करा है। 
गोली : मेरी भी। मेरी मम्मी ने अगर मुझे देखा तो अच्छा नहीं होगा  .... 
अमन : अरे यार ! कैसे से हो तुम लोग ?! चुस्की ठेले पर नहीं मिलेगी तो कहाँ मिलेगी ?
शुभम : हाँ ! और अच्छा तो तब ना होगा ना जब तेरी मम्मी देखेगी तुझे? अभी तो सिर्फ तू  है ना यहाँ ?!
आफ़रीन : सही बात है। चलो पैसे इकट्ठा करते है और गोला खाने चलते है। 
गोली और नीतू की न-नकर को हामी में बदलाकर, सब ने पैसे जोड़-जोड़कर कुल ₹३५ (35) इकट्ठे करे और सब बेबाक गोला खाने 'चुटकी की चुस्की ' ठेले पर पहुंच गए। वे पहले ही तय कर चुके थे की पैसे अगर काम पड़े तो गोली और नीतू आधा-आधा बाँट कर खाएगे। 
अमन : चाचा चुस्की चाहिए। ५ (5) !
शुभम : अरे पहले पैसे तो पूछ। कितने  की है ?
गोले वाला : ₹२ (2) की १ (1) चुस्की। 
नीतू : बस ₹२ (2) ?!
गोले वाला : हाँ गुड़िया।  अब बताओ कौन-सा वाला गोला खाओगे तुम सब बच्चे ?
आफ़रीन : काला खट्टा !
अमन : मैंगो !
नीतू : स्ट्रॉबेरी !
गोले वाला : स्तराबरी ?
नीतू : नहीं, स्ट्रॉबेरी ! लाल रंग की। 
गोले वाला : अच्छा लाल। 
गोली : मेरे लिए  ...... आफ़रीन वाला ही। 
शुभम : मेरे वाले में सब मिला दो !
शुभम को सुन सब उसके स्वाद को लेकर मज़ाकिय चिंतन में हँस उठे। 

गोले वाला अपनी ठेली पर रखी बर्फ़ की सिल्ली को तोड़ने - पीसने लगता है।  रंग वाला शरबत बर्फ में मिलते देख बच्चों की आँखें बड़ी , गला सूखने व मुँह में पानी आने लगा। सब गोले की स्वादिष्ट ठंडक में खो गए थे। पर गोली अपनी मम्मी के देखने से पहले गोला ख़त्म करने को बर्फ को दाँतों से काट कर खाने लगा, उसके दांतों में झंकार उठी और दिमाग में जैसे मुँह-नाक के ज़रिये एक बिजली की तरंग दौड़ गयी। इतना जोखिम भरा दॉंव कर के उसने धीरे धीरे चुस्की चूसते दोस्तों को खमंड से देखा और वे सब हँस पड़े। 
शाम के ७ (7) बज चुके थे , सब बच्चें जल्दी अपना अपना गोला ख़त्म कर , अगल दिन मिलने - खेलने का समय निर्धारित कर अपने अपने घर को अलविदा ले चले गए। 
अब बच्चें रोज़ शाम में खेलने व 'चुटकी की चुस्की ' का इंतज़ार करते थे। 
अमन : कुमार चाचा , ये हरा वाला शरबत कैसा होता है ?
नीतू : ये वॉटरमेलन वाला है ?
कुमार (गोले वाला): वातरमा..... नहीं बेटा। ये खस-खस है। 
आफरीन : हाँ ! इसका शरबत मेरी खाला बनाती है। 
कुमार : हाँ, तुम बच्चों के लिए बनाऊँ ये वाला ?
गोली : नहीं ! मेरे लिए आम वाला ही। 
शुभम : मेरे मैं काला खट्टा और ख़स -ख़स दोनों मिलादो। 
सब बच्चें गोले का स्वाद चख ही रहे थे की गोली की मम्मी बाज़ार से लौटते हुए गोली को घर ले जाने बच्चों के पास आयी। गोली को ठेली की चुस्की खाता देख वे गुस्से से तिलमिला उठी - गुस्सा इस बात का कि उनके मना करने के बावजूद उनका बेटा ठेली का गन्दा गोला खा रहा है। 
गोली की मम्मी : गोली ! मेने बाहार से , ठेलो से खाने को मना करा था ना ... (गोली के कान मरोड़ते हुए ) मेरी बात समझ नहीं आती तुम्हे ! और मेरे पीछे से ! छुपकर ! चुस्की चखी जा रही है। चलो घर पर बताती हुँ। 
नीतू : आंटी सॉरी !
अमन : आंटी आज पहली बार ही खायी है। सॉरी !
शुभम : हां आंटी , सॉरी। 
गोली की मम्मी : तुम सब के घर पर पता है कि बाहार का कुछ भी खाते हो तुम लोग ?! और नीतू तुम तो इतनी सॉफिस्टिकेटेड (sophisticated/ विवेकी ) फ़ैमिली से हो  .... तुम्हारी घर पर पता है ?
बच्चों में डर और चुप्पी की लहर दौड़ गयी। 
गोली की मम्मी : मैं बताती हुँ  तुम सब के घर पर। 
गोली की मम्मी कुमार (गोले वाले) को घृणात्मक नज़रों से घूरते हुए गोली को जोर जबरदश्ती से घर ले गयी। 
बच्चे भी डर के मारे अपनी आधी अधूरी चुस्की वही फ़ेंक घर भाग गए। 
कुमार को गोली के लिए दुःख हुआ। कुछ समय वहीं रुका फिर दूसरे गली मोहल्ले गोला बेचने चल पड़ा। 
रात के ११ (11) बजे कुमार ठेला ठकेलता अपने झोपड़ी से मकान में पंहुचा। 
कुमार : अरे चुटकी की माँ ! एक गिलास पानी निकालदो। 
कुमार की पत्नी (इंद्रा) पानी का गिलास कुमार के पैरों के करीब पटक कर रखते हुए ,
इंद्रा : १ (1) साल हो गया आपको बोलते अब तो 'चुटकी' का नाम बंद करदो ! बुलाना है तो घर पर राजू  और सुनीता भी तो है। 
कुमार (इंद्रा की बात को नज़रअंदाज़ करते हुए) : हमारे मायने में कड़क गर्मी में बर्फ की चुस्की अतीत की ललक सामान होती है। हमारे बाप - दादा , सबने चखी थी ये। 
इंद्रा : कहाँ की बातें ले कर बैठ रहे हो। सुनो, आज शाम को सारा पानी नहीं भर पायी थी , राजू रो रहा था बहुत और सुनीता अकेले एक बाल्टी पानी ही ला पायी थी। तो कल सुबह ज़्यादा पानी भरने तुम्हे भी चलना है। सुने हो क्या ?
कुमार : ठीक है इंद्रा रानी। जैसा तुम कहो। 
दोनों सुबह ५ (5) बजे पानी भरने दूसरे ज़िले की टूटी सी पानी की पाइप की किनारे लगे नलके पर लाइन लगाने चले गये। 
यहाँ गोली भी १ (1) घंटे बाद , ६ (6) बजे स्कूल जाने के लिए उठा। उसके घर पर उस दिन से उसे डाँट , फटकार और ताने ही सुनने को मिल रहे थे। वो नहा धोकर , यूनिफार्म पहन नाश्ता करने फैमिली के साथ बैठा। उसकी मम्मी उसे पैकेट से जूस डालते हुए 
गोली की मम्मी : ये पीया करो , अच्छा , स्वादिष्ट और पोषणपूर्ण। पर नहीं तुम्हे गंदे पानी की बनी गन्दी चुस्की खानी है। 
गोली नीचे नज़रे कर सुनता रहा। ऐसे सुनते सुनाते कई दिन निकल गए। कुमार बच्चों को देखने अब भी उस मोहल्ले आता था। पर बच्चे अब उसकी चुस्की नहीं खाते थे पर बच्चे उसे देख कर मुस्कान, कभी-कभार हाल चाल पूछ लिया करते थे। 
कुछ दिनों से बच्चों की टोली में नीतू नहीं दिख रही थी। कुमार ने चिंता व जिज्ञासा के कारण एक बार बच्चों से उसका हाल पूछ ही लिया। 
शुभम : अरे चाचा वो बीमार है , उसके पेट में काफी दिनों से दर्द है और बुखार भी है। 
कुमार के चेहरे पर परेशानी व चिंतन की शिकन आ गयी। 
अमन : अरे कुमार चाचा वो ठीक हो जाएगी। उसके घर वाले बड़े डॉक्टरों से उसका इलाज करा रहे है। 
गोली : वो घर पर हैल्थी (healthy) खाना भी खाती है , रोज़  पैकेट से जूस भी पीती है। 
आफरीन : हां, आप ज़ादा फ़िक्र न करो। 
कुमार बच्चों का उसके प्रति गहन चिंतन करते देख उसके दिल में पितृत्व प्रेम उमड़ पड़ा। 
शाम के ११ (11) बज रहे थे , कुमार ठेला ठकेलता घर लौट रहा था। उसे नीतू में अपनी चुटकी की झलक दिख  रही थी। हस्ती , खिल खिलाती .... बीमार चुटकी। 
इंद्रा : अरे आ गए तुम ?! देखो राजू के पेट में कितना दर्द हो रहा है। कल सुबह इसका दवाई लाना ही पड़ेगा। 
कुमार : हम्म्म..... सही कह रही हो। बर्फ़ जमा दी तुमने ? 
इंद्रा : हाँ , पर आज नलके  के पास शोर गुल सा था , तुम्हें पता चला ?
कुमार : मुझे कुछ नहीं पता चला। कुछ खाने को है तो निकाल दो वरना सोने जा रहे है हम। 
इंद्रा : मेने सुना वहाँ नलके के पीछे की बड़ी फैक्ट्री वाले घूम रहे थे। 
कुमार : जब सब पता ही है तुम्हे तो क्या पूछ रही हो ?! हम सोने जा रहे है , कल राजू को कुछ खिला कर दवाई खिला देना। 
सोते सुलाते कुछ दिन और बीत गए। मोहल्ले में बच्चों की टोली की संख्या बेहद कम हो गयी थी। वहाँ सशक्त लोगो की असशक्त कुमार पर घृणा के तीखे बाण रोज़ चलते थे। परन्तु कुमार बेबस कमाई व बच्चों की मुस्कान पाने रोज़ उस मोहल्ले से गुज़रने पहुँच जाता था। एक दिन अमन अकेला उदास सा घुमता उसे दिखा , कुमार ने आस पास चौकन्ना होकर देखा फिर अमन से बात शुरू की 
कुमार : अरे अमन बच्चे कैसे हो? आज कल कोई दिखता नहीं है ?
अमन (धीमी आवाज़ में ) हम्म .... ठीक हुँ। 
कुमार : तुम्हारे दोस्त कहाँ है सब ? नीतू बेटी ठीक है ?
अमन : चाचा   .... मम्मी बोलती है तुम ठीक नहीं हो। तुम्हरी बर्फ गन्दी है। उससे सब बीमार होते है। और तुम्हारी वजह से नीतू  .... 
कुमार (कुछ बुरा अभास सा होते हुए ) : नीतू को क्या हुआ बच्चे ?
अमन के कुछ बताने से पहले ही गोली की मम्मी ने अमन को अपनी ओर खींच लिया। 
गोली की मम्मी : अरे कुछ तो शर्म करो एक हस्ती खेलती बच्ची को गन्दी संदी बर्फ खिला बीमार कर जान ले ली तुमने!!
कुमार के पेरो तले ज़मीन खिसक गयी। उसके हाथ पाओं दुःख और बेचैनी से फूलने लगे। 
गोली की मम्मी : अब बाकि बच्चों को  खाओगे क्या। जाओ भागो यहाँ से !
कुमार बच्चों की पुरानी बातें याद करने लगा , "बड़े डॉक्टरों से उसका इलाज", "हैल्थी खाना भी खाती है , रोज़  पैकेट से जूस" ..... उसे अपनी चुटकी की मौत की यादें भी दहलाने नीतू संग आ गयी। वो भी बीमार थी , उसके भी पेट में दर्द था, बुखार था , वे डायरिया (diarrhea) का शिकार हो गयी थी। 
कुमार ठेला ठकेलता घर पंहुचा। राजू उसे पानी का गिलास थमा कर गया। उसने भगवान का शुक्रान करा कि कम से कम बाकी बच्चे तो इस बीमारी का शिकार नहीं हुए। 
इंद्रा : अरे पता है नलके के पीछे जो बड़ी फैक्ट्री है न , उसके बड़े अफ़सर लोग घूम रहे थे आस पास ?
कुमार (बेपरवाह आवाज़ में ) : नहीं पता था मुझे। 
इंद्रा : अरे वो फैक्ट्री, पैकेट वाले जूस की फैक्ट्री। वो सुनने में आया की जूस में कुछ अजीब सा मिला रहे थे और साथ वाले पाइप में भी वो अजीब सा कुछ जा रहा था  .... तो वो अब पाइप बदलाकर नलके का पानी रोक देंगे।  
कुमार : अच्छा .... अब पानी का कहीं और तालाशना पड़ेगा  .... 
इंद्रा : हाँ। मेने साथ वाली से बात कर ली है, जगह थोड़ी दूर है पर पानी मिल जायेगा। कल सुनीता को लेकर जाऊगी मैं। 
कुमार : कल की बर्फ़ का इंतज़ाम तो हो गया ना ? बर्फ़ का गोला बेचने लिए नए मोहल्ले भी तलाशने है। 
अगली सुबह इंद्रा पानी भरने और कुमार 'चुटकी की चुस्की' ठेला ठकेलता चल पड़ा। 


3 comments:

  1. अब कितनी ही नीतू और चुटकी का हिसाब रखेंगे ...??
    कड़वी सचाई समाज को कैसे ही समझायेंगे ....??!!

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  2. Mind blowing 😮
    Story leaves speechless 😶

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    1. Thanks Riddhi for appreciation !!😊
      It means a lot!!😇

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